कविवर बिहारी : जीवन-परिचय एवं रचनाएँ
(Bihari Biography in Hindi | बिहारी सतसई)
प्रस्तावना
कविवर बिहारी हिंदी साहित्य के रीतिकाल के सर्वाधिक प्रतिभाशाली और प्रभावशाली कवि माने जाते हैं। वे मुख्यतः श्रृंगार रस के कवि थे और उन्होंने दोहा जैसे लघु छंद में गागर में सागर भरने का अद्भुत कार्य किया। उनके दोहे भाव-गंभीरता, कल्पना, अलंकार और सौंदर्य-बोध का श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
प्रख्यात आलोचक पद्मसिंह शर्मा ने बिहारी के दोहों की प्रशंसा करते हुए लिखा है—
“बिहारी के दोहों का अर्थ गंगा की विशाल जल-धारा के समान है, जो शिव की जटाओं में समा तो गई थी, पर बाहर निकलते ही इतनी विस्तृत हो गई कि पृथ्वी भी उसे सीमित न कर सकी।”
कविवर बिहारी का जीवन-परिचय
कविवर बिहारी का जन्म लगभग 1603 ई. (संवत 1660 वि.) में ग्वालियर के निकट बसुवा गोविंदपुर ग्राम में हुआ माना जाता है। इनके पिता का नाम केशवराय था। वे मथुरा के चौबे ब्राह्मण माने जाते हैं।
कुछ विद्वान बिहारी को आचार्य केशवदास (रामचन्द्रिका के रचयिता) का पुत्र भी मानते हैं, यद्यपि इस विषय में मतभेद है।
शिक्षा एवं संस्कार
बिहारी ने निंबार्क संप्रदाय के प्रसिद्ध संत स्वामी नरहरिदास से संस्कृत, प्राकृत और काव्यशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की। युवावस्था का अधिकांश समय उन्होंने मथुरा में अपनी ससुराल में बिताया।
राजाश्रय एवं कवित्व
मुगल बादशाह शाहजहाँ के निमंत्रण पर वे आगरा पहुँचे और बाद में जयपुर के राजा जयसिंह के दरबारी कवि बने। राजा जयसिंह जब नवविवाहिता के प्रेम में डूबकर राजकार्य की उपेक्षा करने लगे, तब बिहारी ने एक अन्योक्तिपूर्ण दोहा लिखकर उन्हें चेताया—
नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं बिकासु इहि काल।
अली कली ही सौं बँध्यो, आगे कौन हवाल॥
इस दोहे का राजा पर गहरा प्रभाव पड़ा और वे पुनः कर्तव्य-पथ पर अग्रसर हुए।
राजा जयसिंह बिहारी की प्रतिभा से अत्यंत प्रभावित थे और वे प्रत्येक दोहे पर एक स्वर्ण-मुद्रा पुरस्कार स्वरूप देते थे।
जीवन का उत्तरार्ध
पत्नी की मृत्यु के बाद बिहारी का मन भक्ति और वैराग्य की ओर झुक गया। उन्होंने लगभग 723 दोहों की रचना की, जिन्हें ‘बिहारी सतसई’ नाम से जाना जाता है। यह ग्रंथ लगभग 1662 ई. में पूर्ण हुआ।
कविवर बिहारी का निधन 1663 ई. (संवत 1720 वि.) में हुआ।
कविवर बिहारी की रचनाएँ
बिहारी सतसई
बिहारी की एकमात्र और अमर रचना है—
‘बिहारी सतसई’
यह एक श्रृंगार रस प्रधान मुक्तक काव्य-ग्रंथ है, जिसमें कुल 723 दोहे संकलित हैं। इन दोहों में—
नायक-नायिका भेद
प्रेम, विरह और सौंदर्य
अलंकार, व्यंजना और प्रतीक
सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक चित्रण
अत्यंत संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
बिहारी के दोहों के संबंध में प्रसिद्ध पंक्ति है—
सतसैया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर।
देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गम्भीर॥
साहित्य में स्थान
रीतिकालीन कवि बिहारी हिंदी साहित्य में अद्वितीय स्थान रखते हैं। उन्होंने केवल दोहों के माध्यम से प्रेम और श्रृंगार की संपूर्ण अनुभूति को व्यक्त कर दिया।
आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के अनुसार—
“प्रेम के भीतर की समस्त सामग्री बिहारी ने केवल सात सौ दोहों में प्रस्तुत कर दी है। उनके जोड़ का हिंदी में कोई दूसरा कवि नहीं हुआ।”
इसी कारण बिहारी को हिंदी साहित्य में महाकवि का स्थान प्राप्त है।
निष्कर्ष
कविवर बिहारी हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। उनकी बिहारी सतसई आज भी पाठकों, विद्यार्थियों और विद्वानों के लिए प्रेरणास्रोत है। अल्प शब्दों में गहन भाव व्यक्त करने की कला में वे अद्वितीय हैं।
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बिहारी सतसई का दोहा : भावार्थ, सन्दर्भ, प्रसंग एवं काव्य-सौन्दर्य
(मेरी भव-बाधा हरौ – दोहा व्याख्या | Bihari Satsai Explanation in Hindi)
मूल दोहा
मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।
जा तन की झाई परै, स्यामु हरित-दुति होइ॥
शब्दार्थ
भव-बाधा – संसार से जुड़ा हुआ दुःख, जन्म-मरण का बंधन
हरौ – दूर करो, नष्ट करो
नागरि – चतुर, सुशीला, कलावती नायिका
झाई परै – झलक पड़ना, प्रतिबिम्ब पड़ना
स्यामु – श्रीकृष्ण, श्याम वर्ण, पाप का प्रतीक
हरित-दुति –
हरी कान्ति
प्रसन्नता
कान्तिहीन होना (द्युति का हरण)
सन्दर्भ
प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिंदी काव्य-खण्ड’ में संकलित रीतिकाल के रससिद्ध कवि बिहारी द्वारा रचित महाकाव्यात्मक ग्रंथ ‘बिहारी सतसई’ के ‘भक्ति’ शीर्षक के अंतर्गत लिया गया है।
विशेष: ‘भक्ति’ शीर्षक के अंतर्गत आने वाले सभी दोहों के लिए यही सन्दर्भ मान्य होगा।
प्रसंग
कवि बिहारी ने अपने ग्रंथ के प्रारम्भ में मंगलाचरण के रूप में श्री राधा जी की वन्दना की है। वे राधा को सांसारिक दुःखों का नाश करने वाली, दिव्य और कल्याणकारी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
व्याख्या (भावार्थ)
कवि कहते हैं—
वह चतुर और गुणसम्पन्न राधा जी मेरी सांसारिक बाधाओं और दुःखों को दूर करें। जिनके गौर एवं पीतवर्ण शरीर की केवल झलक पड़ने मात्र से ही श्यामवर्ण श्रीकृष्ण की कान्ति हरित (हरी) हो जाती है।
इस दोहे के भाव को कई स्तरों पर समझा जा सकता है—
रंग-संयोजन का अर्थ
राधा के पीत (पीले) शरीर की आभा जब श्याम (नीले) कृष्ण पर पड़ती है तो दोनों रंग मिलकर हरा रंग उत्पन्न करते हैं। यह बिहारी के चित्रकला एवं रंग-ज्ञान को दर्शाता है।
भक्ति-भाव का अर्थ
राधा की दिव्य झलक मात्र से श्रीकृष्ण भी प्रसन्न हो उठते हैं, अर्थात् हरित-कान्ति धारण कर लेते हैं।
आध्यात्मिक अर्थ
राधा के ज्ञानमय शरीर की झलक से मन की श्यामलता (पाप) नष्ट हो जाती है और आत्मा शुद्ध हो जाती है।
श्रृंगारात्मक अर्थ
राधा की अनुपम कान्ति के सामने स्वयं श्रीकृष्ण की द्युति भी मन्द पड़ जाती है, अर्थात् वे फीके प्रतीत होते हैं।
इस प्रकार कवि राधा को भव-सागर से पार लगाने वाली शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
काव्यगत सौन्दर्य
1. भाव पक्ष
मंगलाचरण के रूप में राधा की वन्दना
भक्ति और श्रृंगार का अद्भुत समन्वय
2. कला पक्ष
रंग-संयोजन (नील + पीत = हरित) का सजीव चित्रण
कवि का सूक्ष्म चित्रकला-ज्ञान प्रकट होता है
3. भाषा एवं शैली
भाषा – ब्रजभाषा
शैली – मुक्तक शैली
4. रस
श्रृंगार रस
भक्ति रस
5. छन्द
दोहा
6. अलंकार
अनुप्रास अलंकार – “हरौ, राधा नागरि”
श्लेष अलंकार –
‘भव-बाधा’
‘झाई’
‘स्यामु’
‘हरित-दुति’
(एक शब्द के अनेक अर्थ होने से)
7. गुण
प्रसाद गुण
माधुर्य गुण
सहायक उदाहरण
बिहारी के रंग-ज्ञान का परिचय देने वाला एक अन्य प्रसिद्ध दोहा—
अधर धरत हरि कै परत, ओठ डीठि पट जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इन्द्रधनुष सँग होति॥
निष्कर्ष
यह दोहा बिहारी की भक्ति भावना, श्रृंगार चेतना, रंग-बोध और अलंकारिक प्रतिभा का श्रेष्ठ उदाहरण है। अल्प शब्दों में गहन अर्थ भर देने की कला में बिहारी अतुलनीय हैं।
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(मोर-मुकुट की चंद्रिकनु – दोहा व्याख्या | Bihari Satsai Explanation in Hindi)
मूल दोहा
मोर-मुकुट की चंद्रिकनु, यौं राजत नंदनंद।
मनु ससि सेखर की अकस, किय सेखर सत चंद॥
शब्दार्थ
चंद्रिकनु – चन्द्रिकाएँ, चन्द्रमा के समान चमकती आकृतियाँ
राजत – शोभायमान होना, सुशोभित होना
नंदनंद – नंद के पुत्र, भगवान् श्रीकृष्ण
मनु – मानो, जैसे
ससि सेखर – जिनके मस्तक पर चन्द्रमा शोभा देता है, अर्थात् भगवान् शंकर
अकस – प्रतिस्पर्धा, होड़
सेखर – मुकुट, मस्तक
सत चंद – सैकड़ों चन्द्रमा
प्रसंग
प्रस्तुत दोहा रीतिकाल के महाकवि बिहारी द्वारा रचित ‘बिहारी सतसई’ से उद्धृत है। इस दोहे में कवि ने भगवान् श्रीकृष्ण के सिर पर विराजमान मोर-मुकुट का अत्यंत मोहक एवं कलात्मक वर्णन किया है। बिहारी अपनी सूक्ष्म दृष्टि और कल्पनाशक्ति के माध्यम से श्रीकृष्ण के सौंदर्य को अलंकारिक रूप प्रदान करते हैं।
व्याख्या (भावार्थ)
कवि कहते हैं कि नंदनंदन श्रीकृष्ण के सिर पर मोरपंखों का मुकुट अत्यंत शोभायमान प्रतीत हो रहा है। उस मुकुट में स्थित स्वर्णाभ चन्द्राकार चन्द्रिकाएँ इतनी दीप्तिमान हैं कि उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो भगवान् श्रीकृष्ण ने भगवान् शंकर से प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपने मस्तक पर सैकड़ों चन्द्रमा धारण कर लिए हों।
अर्थात् जहाँ भगवान् शंकर के सिर पर केवल एक चन्द्रमा शोभा देता है, वहीं श्रीकृष्ण के मुकुट में अनेक चन्द्रिकाएँ एक साथ चमक रही हैं। इस प्रकार कवि ने श्रीकृष्ण के सौंदर्य को शिव से भी श्रेष्ठ और अधिक आकर्षक सिद्ध किया है।
काव्यगत सौन्दर्य
1. भाव पक्ष
श्रीकृष्ण के अतुलनीय एवं अलौकिक सौंदर्य का सजीव चित्रण
देवताओं के मध्य सौंदर्य-प्रतिस्पर्धा की कल्पना
2. कला पक्ष
मोर-मुकुट की चन्द्रिकाओं की तुलना शिव के चन्द्रमा से
कवि की अद्भुत कल्पनाशीलता एवं प्रतीकात्मक दृष्टि
3. भाषा एवं शैली
भाषा – ब्रजभाषा
शैली – मुक्तक शैली
4. रस
श्रृंगार रस (माधुर्य श्रृंगार)
5. छन्द
दोहा छन्द
6. अलंकार
अनुप्रास अलंकार – “मोर-मुकुट”, “ससि सेखर”
उत्प्रेक्षा अलंकार –
“मनु ससि सेखर की अकस”
“किय सेखर सत चंद”
सभंग श्लेष अलंकार –
‘ससि सेखर’
‘सेखर’
7. गुण
माधुर्य गुण
प्रसाद गुण
विशेष टिप्पणी
यह दोहा बिहारी की चित्रात्मक शैली और अलंकार-प्रयोग की कुशलता का उत्कृष्ट उदाहरण है। मोर-मुकुट की चन्द्रिकाओं को सैकड़ों चन्द्रमाओं के रूप में देखना कवि की कल्पना की ऊँचाई को दर्शाता है।
निष्कर्ष
प्रस्तुत दोहा सिद्ध करता है कि बिहारी केवल शब्दों के कवि नहीं, बल्कि दृश्यात्मक सौंदर्य के सृजनकर्ता हैं। श्रीकृष्ण के सौंदर्य को शिव के चन्द्रमा से प्रतिस्पर्धा में खड़ा करना उनकी काव्य-प्रतिभा की चरम सीमा है।
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(सोहत ओढ़ पीतु पटु – दोहा व्याख्या | Bihari Satsai Explanation in Hindi)
मूल दोहा
सोहत ओढ़ पीतु पटु, स्याम सलौने गात।
मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात॥
शब्दार्थ
सोहत – सुशोभित हो रहे हैं
ओढ़ – धारण करके
पीतु पटु – पीले वस्त्र
स्याम – श्यामवर्ण, श्रीकृष्ण
सलौने – अत्यंत सुन्दर, मनोहर
गात – शरीर
नीलमनि-सैल – नीलमणि के समान नीला पर्वत
आतपु – सूर्य का प्रकाश, धूप
प्रभात – प्रातःकाल
प्रसंग
प्रस्तुत दोहा रीतिकाल के महान कवि बिहारी द्वारा रचित ‘बिहारी सतसई’ से उद्धृत है। इस दोहे में कवि ने पीले वस्त्र धारण किए हुए भगवान् श्रीकृष्ण के श्याम शरीर के अनुपम और अलौकिक सौंदर्य का सजीव वर्णन किया है। बिहारी यहाँ रंग-संयोजन और दृश्यात्मक कल्पना के माध्यम से पाठक के मन में एक सुंदर चित्र उकेरते हैं।
व्याख्या (भावार्थ)
कवि कहता है कि श्यामवर्ण भगवान् श्रीकृष्ण अपने सुंदर शरीर पर पीले रंग के वस्त्र धारण किए हुए अत्यंत शोभायमान प्रतीत हो रहे हैं। उनका यह सौंदर्य ऐसा लगता है मानो नीलमणि के पर्वत पर प्रातःकाल की सुनहरी धूप पड़ रही हो।
अर्थात् श्रीकृष्ण का श्याम शरीर नीलमणि पर्वत के समान है और उनके पीले वस्त्र उस पर्वत पर पड़ने वाली प्रभातकालीन धूप के समान प्रतीत होते हैं। इस उपमा के माध्यम से कवि ने श्रीकृष्ण के सौंदर्य को अत्यंत कोमल, उज्ज्वल और मनोहारी रूप में प्रस्तुत किया है।
काव्यगत सौन्दर्य
1. भाव पक्ष
श्रीकृष्ण के अद्वितीय एवं अलौकिक सौंदर्य का भावपूर्ण चित्रण
भक्ति और श्रृंगार रस का सुसंगत समन्वय
2. कला पक्ष
रंग-वैचित्र्य (श्याम एवं पीत वर्ण) का सजीव चित्र
कवि की चित्रात्मक एवं दृश्यात्मक कल्पना का सुंदर उदाहरण
3. भाषा एवं शैली
भाषा – ब्रजभाषा
शैली – मुक्तक शैली
4. रस
श्रृंगार रस
भक्ति रस
5. छन्द
दोहा छन्द
6. अलंकार
अनुप्रास अलंकार –
“पीतु पटु”
“स्याम सलौने”
“पर्यो प्रभात”
उत्प्रेक्षा अलंकार –
“मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात”
7. गुण
माधुर्य गुण
विशेष टिप्पणी
यह दोहा बिहारी की चित्रकला-सदृश काव्य शैली का श्रेष्ठ उदाहरण है। अल्प शब्दों में रंग, प्रकाश और सौंदर्य का ऐसा संयोजन प्रस्तुत करना बिहारी की काव्य-प्रतिभा को सिद्ध करता है।
निष्कर्ष
प्रस्तुत दोहा स्पष्ट करता है कि बिहारी केवल भावों के नहीं, बल्कि दृश्यों के भी महान कवि हैं। श्रीकृष्ण के श्याम शरीर और पीत वस्त्रों के माध्यम से उन्होंने प्रकृति और ईश्वर-सौंदर्य का अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया है।
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(अधर धरत हरि कै परत – दोहा व्याख्या | Bihari Satsai Explanation in Hindi)
मूल दोहा
अधर धरत हरि कै परत, ओठ-डीठि-पट जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इन्द्रधनुष-हँग होति॥
शब्दार्थ
अधर – नीचे का होंठ
धरात – रखते हुए
हरि – भगवान् श्रीकृष्ण
ओठ – होंठ (लाल कान्ति)
डीठि – दृष्टि, नेत्र (श्वेत कान्ति)
पट – वस्त्र (पीत कान्ति)
जोति – तेज, चमक, कान्ति
हरित – हरा
बाँसुरी – मुरली
इन्द्रधनुष-हँग – इन्द्रधनुष के समान, बहुरंगी
प्रसंग
प्रस्तुत दोहा रीतिकाल के महाकवि बिहारी द्वारा रचित ‘बिहारी सतसई’ से उद्धृत है। इस दोहे में कवि ने बाँसुरी बजाते हुए भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनकी हरे रंग की बाँसुरी का अत्यंत मनोहारी और इन्द्रधनुषी सौंदर्य में चित्रण किया है। यह दोहा बिहारी के रंग-संयोजन ज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण है।
व्याख्या (भावार्थ)
कवि कहते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण अपने लाल होंठों पर हरे रंग की बाँसुरी रखकर उसे मधुर स्वर में बजा रहे हैं। उस समय—
होंठों की रक्त वर्ण कान्ति,
नेत्रों की श्वेत कान्ति,
वस्त्रों की पीत कान्ति,
तथा शरीर की श्याम कान्ति,
इन सभी रंगों की झलक जब हरी बाँसुरी पर पड़ती है, तो वह बाँसुरी इन्द्रधनुष के समान बहुरंगी और दिव्य शोभा धारण कर लेती है।
इस प्रकार बाँसुरी केवल वाद्य यंत्र न रहकर रंगों और सौंदर्य का सजीव प्रतीक बन जाती है।
काव्यगत सौन्दर्य
1. भाव पक्ष
श्रीकृष्ण के माधुर्यपूर्ण एवं दिव्य स्वरूप का सजीव चित्रण
भक्ति भावना से ओत-प्रोत सौंदर्य वर्णन
2. कला पक्ष
रंग-संयोजन का अद्भुत ज्ञान
दृश्यात्मक एवं चित्रात्मक शैली का उत्कृष्ट प्रयोग
3. भाषा एवं शैली
भाषा – ब्रजभाषा
शैली – मुक्तक शैली
4. रस
भक्ति रस (माधुर्य भक्ति)
5. छन्द
दोहा छन्द
6. अलंकार
अनुप्रास अलंकार – पूरे दोहे में ध्वनि-सौंदर्य
यमक अलंकार – “अधर धरत”
उपमा अलंकार –
बाँसुरी की बहुरंगी शोभा की तुलना इन्द्रधनुष से
7. गुण
प्रसाद गुण
विशेष टिप्पणी
यह दोहा सिद्ध करता है कि बिहारी केवल श्रृंगार के ही नहीं, बल्कि रंग, प्रकाश और सौंदर्य के महान कवि भी हैं। बाँसुरी पर पड़ने वाले विभिन्न रंगों की कल्पना कवि की सूक्ष्म दृष्टि और उच्च काव्य-प्रतिभा को उजागर करती है।
निष्कर्ष
प्रस्तुत दोहा बिहारी की चित्रात्मक काव्य शैली, अलंकार-प्रयोग की कुशलता और भक्ति-भावना का श्रेष्ठ उदाहरण है। अल्प शब्दों में इन्द्रधनुषी सौंदर्य रच देना बिहारी की अनुपम विशेषता है।
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(या अनुरागी चित्त की – दोहा व्याख्या | Bihari Satsai Explanation in Hindi)
मूल दोहा
या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोई।
ज्यों-ज्यौं बूड़े स्याम रँग, त्यों-त्यौं उज्जलु होई॥
शब्दार्थ
अनुरागी – प्रेम करने वाला, प्रेम में रँगा हुआ
चित्त – मन
गति – अवस्था, दशा
समुझै – समझता
बूड़े – डूबता है, लीन होता है
स्याम रँग – कृष्ण का श्याम रंग, कृष्ण-भक्ति का रंग
उज्जलु – उज्ज्वल, पवित्र, श्वेत
प्रसंग
प्रस्तुत दोहा रीतिकाल के महाकवि बिहारी द्वारा रचित ‘बिहारी सतसई’ से उद्धृत है। इस दोहे में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि भगवान् श्रीकृष्ण के प्रेम और भक्ति में डूबने से मन की मलिनता, पाप और कलुषता नष्ट हो जाती है, और मन क्रमशः अधिक शुद्ध तथा पवित्र बनता जाता है।
व्याख्या (भावार्थ)
कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण से प्रेम करने वाले मेरे मन की अवस्था अत्यंत अद्भुत और रहस्यमयी है, जिसे सामान्य बुद्धि से समझ पाना कठिन है। संसार का नियम यह है कि कोई भी वस्तु काले रंग में डूबने पर और अधिक काली हो जाती है।
परंतु श्रीकृष्ण स्वयं श्यामवर्ण हैं, फिर भी उनके प्रेम और भक्ति में जैसे-जैसे मेरा मन डूबता जाता है, वैसे-वैसे वह अधिक उज्ज्वल, शुद्ध और पवित्र होता चला जाता है। अर्थात् कृष्ण-भक्ति मन के समस्त विकारों, पापों और अज्ञान को दूर कर देती है।
यहाँ कवि ने भक्ति की परिवर्तनकारी शक्ति को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।
काव्यगत सौन्दर्य
1. भाव पक्ष
कृष्ण-भक्ति द्वारा मन की शुद्धि का मार्मिक चित्रण
आध्यात्मिक अनुभूति की गहन अभिव्यक्ति
2. कला पक्ष
सामान्य भौतिक नियम के विपरीत आध्यात्मिक सत्य की स्थापना
गूढ़ और सूक्ष्म दार्शनिक भाव
3. भाषा एवं शैली
भाषा – ब्रजभाषा
शैली – मुक्तक शैली
4. रस
शान्त रस
5. छन्द
दोहा छन्द
6. अलंकार
श्लेष अलंकार – ‘स्याम रँग’ (काला रंग एवं कृष्ण-भक्ति)
पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकार – “ज्यों-ज्यौं… त्यों-त्यों”
विरोधाभास अलंकार –
काले रंग में डूबकर उज्ज्वल होना
7. गुण
माधुर्य गुण
विशेष टिप्पणी
यह दोहा बिहारी की भक्ति-दृष्टि, दार्शनिक गहराई और अलंकारिक कुशलता का उत्कृष्ट उदाहरण है। अल्प शब्दों में मन की आध्यात्मिक यात्रा को व्यक्त करना उनकी काव्य-प्रतिभा को सिद्ध करता है।
निष्कर्ष
प्रस्तुत दोहा यह सिद्ध करता है कि कृष्ण-भक्ति आत्मा को शुद्ध और प्रकाशमय बना देती है। बाह्य नियमों के विपरीत जाकर भक्ति के आंतरिक सत्य को उजागर करना बिहारी की विशिष्टता है।
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बिहारी सतसई का भक्ति-दोहा : विस्तृत व्याख्या, भावार्थ एवं काव्य-सौन्दर्य
(तौ लगु या मन-सदन मैं – Bihari Satsai Bhakti Doha Explanation in Hindi)
मूल दोहा
तौ लगु या मन-सदन मैं, हरि आर्दै किहिं बाट।
विकट जटे जौ लगु निपट, खुटै न कपट-कपाट॥
शब्दार्थ (विस्तृत)
तौ लगु – तब तक, उस समय तक
मन-सदन – मनरूपी भवन, हृदय
हरि – भगवान्, श्रीकृष्ण, ईश्वर
आर्दै – प्रवेश करेंगे, आएँगे
बाट – मार्ग, रास्ता
विकट – कठिन, मजबूत
जटे – कसकर जड़े हुए
जौ लगु – जब तक
निपट – पूरी तरह, सम्पूर्ण रूप से
खुटै – खुलेंगे
कपट-कपाट – कपट, छल, दंभ और अहंकार रूपी दरवाजे
प्रसंग
प्रस्तुत दोहा रीतिकाल के महाकवि बिहारी द्वारा रचित ‘बिहारी सतसई’ का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भक्ति-दोहा है। इसमें कवि ने ईश्वर-प्राप्ति के आंतरिक मार्ग को स्पष्ट करते हुए बताया है कि केवल बाहरी पूजा, आडंबर या शब्दों की भक्ति पर्याप्त नहीं है, बल्कि हृदय की शुद्धता और कपट-रहितता ही सच्ची भक्ति का आधार है।
विस्तृत व्याख्या (भावार्थ)
कवि बिहारी कहते हैं—
जब तक यह मनरूपी घर कपट, छल, द्वेष, ईर्ष्या और अहंकार के द्वारों से बंद है, तब तक ईश्वर उसमें प्रवेश कैसे कर सकते हैं?
मन के भीतर कपट के ये द्वार इतने दृढ़ और जटिल होते हैं कि वे सहजता से खुलते नहीं। जब तक इन कपट-रूपी किवाड़ों को पूरी तरह खोलकर हटा नहीं दिया जाता, तब तक हृदय में भगवान् का आगमन और निवास असंभव है।
अर्थात्—
कपटपूर्ण मन में भक्ति केवल दिखावा है
छल से भरे हृदय में ईश्वर का वास नहीं होता
जब मन पूर्णतः निष्कपट, सरल और निर्मल हो जाता है, तभी ईश्वर उसमें प्रवेश करते हैं
यह दोहा मनुष्य को आत्मपरीक्षण की ओर प्रेरित करता है और बताता है कि भक्ति का मार्ग भीतर से होकर जाता है, बाहर से नहीं।
दार्शनिक भाव
यह दोहा भारतीय भक्ति-दर्शन का मूल सिद्धांत प्रस्तुत करता है—
ईश्वर बाहर नहीं, भीतर मिलते हैं।
और भीतर तभी आते हैं, जब भीतर कपट नहीं होता।
काव्यगत सौन्दर्य (विस्तारपूर्वक)
1. भाव पक्ष
निर्मल मन से ईश्वर-प्राप्ति की सशक्त और स्पष्ट अभिव्यक्ति
भक्ति को आडंबर से अलग कर आत्मशुद्धि से जोड़ना
2. कला पक्ष
मन को घर और कपट को किवाड़ के रूप में प्रस्तुत करना—अत्यंत प्रभावशाली रूपक
साधारण प्रतीकों के माध्यम से गूढ़ आध्यात्मिक सत्य की स्थापना
3. भाषा एवं शैली
भाषा – ब्रजभाषा (सरल, सरस, प्रभावशाली)
शैली – मुक्तक शैली (स्वतंत्र भावपूर्ण कथन)
4. रस
भक्ति रस (शुद्ध, शांत और आत्मिक)
5. छन्द
दोहा छन्द – संक्षिप्त होते हुए भी भावगहन
6. अलंकार
रूपक अलंकार –
मन = सदन (घर)
कपट = कपाट (किवाड़)
अनुप्रास अलंकार –
“कपट-कपाट” में ध्वनि-सौंदर्य
7. गुण
प्रसाद गुण – भाव स्पष्ट, सहज और प्रभावशाली
विशेष महत्व
यह दोहा आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि—
यह आडंबरयुक्त भक्ति पर प्रहार करता है
चरित्र की पवित्रता को धर्म का आधार बनाता है
आत्मशुद्धि को ईश्वर-प्राप्ति की कुंजी बताता है
निष्कर्ष
प्रस्तुत दोहा सिद्ध करता है कि ईश्वर को पाने का मार्ग बाहर नहीं, भीतर है। जब तक मन कपट, छल और अहंकार से मुक्त नहीं होता, तब तक भक्ति अधूरी रहती है। बिहारी ने अत्यंत सरल शब्दों में भक्ति का गहन रहस्य उद्घाटित किया है।
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प्रश्न 7
बिहारी सतसई का भक्ति-दोहा : विस्तृत व्याख्या एवं काव्यगत सौन्दर्य
मूल दोहा
जगतु जनायौ जिहिं सकलु, सो हरि जान्यौ नाँहि।
ज्यौं आँखिनु सबु देखिये, आँखि न देखी जाँहि॥
शब्दार्थ
जगतु – संसार
जनायौ – ज्ञान कराया, उत्पन्न किया
जिहिं – जिसने
सकलु – सम्पूर्ण
हरि – ईश्वर, भगवान
जान्यौ नाँहि – नहीं जाना, स्मरण नहीं किया
ज्यौं – जैसे
आँखिनु – आँखों से
सबु देखिये – सब कुछ देखा जाता है
आँखि न देखी जाँहि – आँख स्वयं को नहीं देख सकती
प्रसंग
प्रस्तुत दोहा रीतिकालीन महाकवि बिहारी द्वारा रचित ‘बिहारी सतसई’ का एक अत्यंत विचारोत्तेजक भक्ति-दोहा है। इसमें कवि ने मानव की उस विडंबनापूर्ण स्थिति को उजागर किया है, जिसमें वह संसार के ज्ञान में तो निपुण हो जाता है, किंतु उस ईश्वर को भूल जाता है, जिसने उसे यह समस्त ज्ञान प्रदान किया है। कवि इस माध्यम से मनुष्य को ईश्वर-स्मरण और आत्मबोध की ओर प्रेरित करते हैं।
विस्तृत व्याख्या
कवि बिहारी कहते हैं कि—
जिस ईश्वर ने मनुष्य को सम्पूर्ण संसार का ज्ञान कराया, जिसने उसे देखने, समझने और जानने की शक्ति प्रदान की, उसी ईश्वर को मनुष्य नहीं जान पाया।
मनुष्य संसार की हर वस्तु, हर घटना और हर ज्ञान को पाने में व्यस्त रहता है, परंतु उस मूल सत्ता की ओर ध्यान नहीं देता, जो इन सबका कारण है।
कवि इस बात को अत्यंत सुंदर और प्रभावशाली दृष्टांत के माध्यम से स्पष्ट करते हैं—
जिस प्रकार आँखों से हम संसार की प्रत्येक वस्तु को देख सकते हैं, परंतु आँखें स्वयं को नहीं देख पातीं, उसी प्रकार मनुष्य भी संसार के हर तत्व को जान लेता है, पर ईश्वर को नहीं जान पाता, जबकि वही ईश्वर समस्त ज्ञान का मूल स्रोत है।
इस प्रकार यह दोहा मनुष्य की आत्मविस्मृति, ईश्वर-विमुखता और भौतिक ज्ञान के अहंकार पर तीखा प्रहार करता है।
दार्शनिक भाव
यह दोहा भारतीय भक्ति-दर्शन और आत्मज्ञान की गूढ़ अवधारणा को प्रकट करता है—
मनुष्य बाहरी ज्ञान में जितना आगे बढ़ता है,
यदि वह ईश्वर-स्मरण से विमुख हो जाए,
तो उसका ज्ञान अधूरा रह जाता है।
काव्यगत सौन्दर्य (विस्तारपूर्वक)
1. भाव पक्ष
मनुष्य की ईश्वर-विस्मृति का मार्मिक चित्रण
भौतिक ज्ञान और आध्यात्मिक अज्ञान का सशक्त विरोधाभास
ईश्वर-भक्ति के प्रति गहन प्रेरणा
2. कला पक्ष
आँख और देखने का अत्यंत सटीक एवं प्रभावशाली दृष्टांत
अमूर्त दार्शनिक सत्य को सरल प्रतीक के माध्यम से प्रस्तुत करना
3. भाषा
ब्रजभाषा – सरल, प्रवाहपूर्ण और भावगर्भित
4. शैली
मुक्तक शैली – स्वतंत्र भाव की संपूर्ण अभिव्यक्ति
5. छन्द
दोहा छन्द – संक्षिप्त होते हुए भी गहन अर्थवत्ता
6. रस
भक्ति रस (शांत और आत्मिक)
7. अलंकार
दृष्टांत अलंकार – आँखों का उदाहरण
रूपक अलंकार – आँख = ज्ञान का साधन
अनुप्रास अलंकार – “जान्यौ”, “जाँहि” में ध्वनि-सौन्दर्य
8. गुण
प्रसाद गुण – अर्थ की स्पष्टता और सहजता
विशेष महत्व
यह दोहा आज के आधुनिक युग में भी अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि—
मनुष्य विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़कर भी ईश्वर और आत्मा को भूलता जा रहा है
यह दोहा आत्ममंथन और ईश्वर-स्मरण की प्रेरणा देता है
यह सिद्ध करता है कि सच्चा ज्ञान वही है, जो ईश्वर-ज्ञान से जुड़ा हो
निष्कर्ष
प्रस्तुत दोहा यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य संसार के हर ज्ञान को प्राप्त कर सकता है, परंतु यदि वह ईश्वर को नहीं जान पाया, तो उसका ज्ञान अधूरा है। बिहारी ने अत्यंत सरल शब्दों में मनुष्य को ईश्वर-स्मरण और आत्मज्ञान का संदेश दिया है।
प्रश्न 8
बिहारी सतसई का भक्ति-दोहा : विस्तृत व्याख्या एवं काव्यगत सौन्दर्य
मूल दोहा
जप, माला, छापा, तिलक, सरै न एकौ कामु।
मन-काँचै नाचे वृथा, साँचे राँचे रामु॥
(UP Board 2011)
शब्दार्थ
जप – मंत्रों का उच्चारण
माला – जप की माला फेरना
छापा – चन्दन या तिलक का चिह्न
तिलक – माथे पर लगाया जाने वाला धार्मिक चिह्न
सरै न – सिद्ध नहीं होता
एकौ कामु – एक भी कार्य
मन-काँचै – कच्चा, चंचल, अस्थिर मन
नाचे – भटकता रहता है
वृथा – व्यर्थ
साँचे – सच्चे
राँचे – प्रसन्न होते हैं
प्रसंग
प्रस्तुत दोहा रीतिकाल के प्रमुख कवि बिहारी द्वारा रचित ‘बिहारी सतसई’ का एक अत्यंत सारगर्भित भक्ति-दोहा है। इसमें कवि ने धार्मिक आडम्बरों और बाह्य क्रियाओं की निरर्थकता को उजागर करते हुए यह स्पष्ट किया है कि ईश्वर की सच्ची भक्ति बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि शुद्ध और निष्कपट मन से होती है।
विस्तृत व्याख्या
कवि बिहारी कहते हैं कि—
केवल मंत्र-जप करना, माला फेरना, चन्दन या तिलक लगाना जैसे बाह्य धार्मिक कर्मों से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। यदि मन शुद्ध नहीं है, यदि हृदय में सच्चा प्रेम और समर्पण नहीं है, तो ये सभी क्रियाएँ निष्फल हैं।
जिस व्यक्ति का मन कच्चा और चंचल है, जो भक्ति में स्थिर नहीं रह पाता, वह व्यर्थ ही इधर-उधर के कर्मकाण्डों में उलझा रहता है। उसका मन कभी इधर, कभी उधर भटकता रहता है और वह स्वयं को भक्त समझने का भ्रम पाल लेता है।
कवि स्पष्ट रूप से कहते हैं कि—
भगवान् केवल सच्चे, निर्मल और निष्कपट मन से ही प्रसन्न होते हैं। बाह्य आडम्बर उन्हें रंचमात्र भी प्रभावित नहीं करते।
दार्शनिक भाव
यह दोहा भक्ति आन्दोलन की मूल भावना को व्यक्त करता है—
भक्ति का वास्तविक स्वरूप बाह्य प्रदर्शन नहीं,
बल्कि आन्तरिक पवित्रता और आत्मसमर्पण है।
कबीर से भावसाम्य
इस दोहे में व्यक्त विचार संत कबीरदास के विचारों से पूर्णतः मेल खाते हैं—
माला तो कर में फिरै, जिह्वा मुख में माँहि।
मनुवा तो दस दिस फिरै, ये तो सुमिरन नाहिं॥
दोनों कवि यह स्पष्ट करते हैं कि मन की एकाग्रता के बिना किया गया जप व्यर्थ है।
काव्यगत सौन्दर्य (विस्तृत)
भाव पक्ष
सच्ची भक्ति और आडम्बरयुक्त भक्ति का स्पष्ट भेद
निष्कपट हृदय की महत्ता का प्रभावशाली प्रतिपादन
धार्मिक पाखण्ड पर तीखा व्यंग्य
कला पक्ष
सरल शब्दों में गहन आध्यात्मिक सत्य
अत्यंत सटीक और प्रभावशाली कथन
भाषा
साहित्यिक ब्रजभाषा – सहज, प्रवाहपूर्ण और भावपूर्ण
शैली
मुक्तक शैली – संक्षिप्त किंतु पूर्ण भावाभिव्यक्ति
रस
शान्त रस – आत्मिक शुद्धता और वैराग्य का भाव
छन्द
दोहा छन्द – लघु आकार में गहन अर्थ
अलंकार
अनुप्रास अलंकार – जप, माला, छापा, तिलक
व्यंजना – बाह्य कर्मों की निष्फलता
गुण
प्रसाद गुण – सरलता एवं स्पष्टता
विशेष महत्व
यह दोहा आज के समय में भी अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि—
लोग आज भी धर्म को दिखावे तक सीमित कर देते हैं
यह दोहा आत्ममंथन और सच्ची भक्ति की प्रेरणा देता है
यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर को पाने का मार्ग हृदय से होकर जाता है, माथे से नहीं
निष्कर्ष
प्रस्तुत दोहा हमें यह शिक्षा देता है कि ईश्वर की भक्ति बाहरी आडम्बरों से नहीं, बल्कि सच्चे और शुद्ध मन से होती है। बिहारी ने अत्यंत सरल शब्दों में भक्ति का वास्तविक स्वरूप स्पष्ट किया है, जो हर युग में उतना ही सत्य और प्रभावी है।
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