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मानुष हौं तो वही रसखानि का संदर्भ, प्रसंग सहित व्याख्या । Manus Haun To Wahi Raskhan । Raskhan । UP Board 10th Solutions

"मानुष हौं तो वही रसखानि" (Manus Ho To Wahi Raskhan) की संदर्भ, प्रसंग सहित व्याख्या इस आर्टिकल में की गई है। जो कि रसखान जी की रचना है। और खास बात यह है कि यह पद्यांश यूपी बोर्ड के 10वीं के हिन्दी के काव्य में "सेवैया" शीर्षक से है। तो अगर आप 10वीं में हो तो आपके लिए ये काम की आर्टिकल है। आपके परीक्षा में आ सकता है। 
ये सेवैया शीर्षक का प्रथम "सेवैया" है। आपको ढूढ़ने में दिक्कत ना हो इसलिए हर एक "सेवैया" के लिए अलग - अलग आर्टिकल लिखा गया है। (यह आर्टिकल आप Gupshup News वेबसाइट पर पढ़ रहे हो जिसे लिखा है, अवनीश कुमार मिश्रा ने, ये ही इस वेबसाइट के ऑनर हैं)

                            सेवैया

मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं बज गोकुल गाँव के ग्वारन ।
जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन ॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यौ कर छत्र पुरंदर-धारन ।
जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी-कूल कदंब की डारन ॥ 

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के "काव्य खंड" में "सवैया" शीर्षक से उद्धृत है , जो कि "सुजान-रसखान’ " नामक ग्रंथ से लिया गया है। जिसके रचयिता है "रसखान" जी।

प्रसंग - प्रस्तुत पद्य में कवि रसखान जी पुनर्जन्म पर विश्वास व्यक्त करते हुए। अगले जन्म में किसी भी योनि में जन्म लेने पर श्रीकृष्ण की जन्मस्थान (ब्रज) में जन्म लेने व उनके समीप रहने की कामना की है।

व्याख्या - प्रस्तुत पद्य में कवि रसखान जी पुनर्जन्म में विश्वास करते हुए ये कामना करते हैं कि हे भगवान! अगर मृत्यु के पश्चात मैं मनुष्य योनि जन्म लूं तो हमारी ये कामना है कि। मैं ब्रजभूमि में गोकुल के ग्वालों के मध्य निवास करूं। और यदि मैं पशु योनि में जन्म लूं अर्थात पशु बनू, जिसमें मेरा कोई वश नहीं है, फिर भी मेरी कामना है कि मैं नन्द जी की गायों के बीच विचरण करता रहूँ। आगे रसखान जी अपनी कामना बताते हैं कि यदि मैं अगले जन्म में पत्थर ही बना तो भी मेरी इच्छा यह है कि मैं उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनू, जिसे आपने इन्द्र का घमण्ड चूर करने के लिए और जलमग्न होने से गोकुल ग्राम की रक्षा करने के लिए अपनी अँगुली पर छाते के समान उठा लिया था। कहने का अर्थ यह है कि रसखान जी कह रहे हैं कि अगर मैं पत्थर भी बनू तो ऐसे वैसे पत्थर न बनकर गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनू जिसे कृष्ण ने उंगली पर उठाया था और उससे गोकुल की रक्षा की थी। रसखान जी आगे अपनी इच्छा बताते हुए कहते हैं कि, यदि मुझे पक्षी योनि में भी जन्म लेना पड़ा तो भी मेरी इच्छा है कि मैं यमुना नदी के किनारे स्थित कदम्ब वृक्ष की शाखाओं पर ही निवास करू। अर्थात जहां श्रीकृष्ण अपने मित्रों और गोपियों के साथ खेला करते थे गाय चराया करते थे वहां का पक्षी बनू तो शायद भगवान कृष्ण के दर्शन हो जाया करेगा। या उनके इष्टों के बीच रहने का सौभाग्य प्राप्त हो जायेगा।
प्रस्तुत पद्य में कवि रसखान जी का श्रीकृष्ण के प्रति अगाध प्रेम दिख रहा है, तभी तो वे किसी भी योनि में जन्म लेने पर केवल कृष्ण के जन्मस्थान में जन्म लेने की बात कर रहे हैं।


काव्यगत सौन्दर्य-

रसखान कवि की कृष्ण के प्रति असीम भक्ति को प्रदर्शित किया गया है। उनकी भक्ति इतनी उत्कट है कि वह अगले जन्म में भी श्रीकृष्ण के समीप ही रहना चाहते हैं।
भाषा– ब्रज।
शैली-मुक्तक
रस-शान्त एवं भक्ति।
छन्द-सवैया।
अलंकार-‘कालिंदी-कुल कदंब की डारन’ में अनुप्रास।
गुण–प्रसाद।

कठिन शब्दों के अर्थ - 

मानुष = मनुष्य
ग्वारन = ग्वाले
धेनु = गाय
मॅझारन = मध्य में 
पाहन = पाषाण, पत्थर
पुरंदर = इन्द्र
खग = पक्षी
बसेरो करौं = निवास करू
कालिंदी-कूल = यमुना का किनारा
डारन = डाल पर, शाखा पर

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